नई दिल्ली। मध्य पूर्व में बदलते हालात के बीच अमेरिका को एक के बाद एक बड़े झटकों का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिकी लड़ाकू विमानों को लेकर सामने आई घटनाओं, इराक से अमेरिकी सैन्य वापसी की घोषणा और ईरान से जुड़े अरबों डॉलर के कथित फंड व सोने की खबरों ने पूरे क्षेत्र के बदलते शक्ति-संतुलन पर बहस तेज कर दी है।
ऐसे समय में जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के साथ कूटनीतिक कोशिशें भी जारी हैं, इन घटनाक्रमों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या मध्य पूर्व में अमेरिकी रणनीति अब नए मोड़ पर पहुंच गई है? दूसरी ओर, इजरायल का लेबनान, सीरिया और गाजा को लेकर सख्त रुख इस पूरे समीकरण को और जटिल बना रहा है।
इन घटनाक्रमों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अमेरिका और ईरान के बीच टकराव अब किसी नए मोड़ पर पहुंच रहा है और यदि दोनों देशों के बीच समझौते की कोशिश आगे बढ़ती है, तो इजरायल और खाड़ी देशों की रणनीति किस दिशा में जाएगी।
अमेरिकी F-15 को गिराए जाने की खबर से हलचल
मध्य पूर्व के मौजूदा तनाव के बीच अमेरिकी F-15 लड़ाकू विमान को लेकर एक बड़ा दावा सामने आया। ईरानी सरकारी मीडिया IRIB के हवाले से सोशल मीडिया पर प्रसारित पोस्ट में दावा किया गया कि ईरान ने एक अमेरिकी F-15 लड़ाकू विमान को shoulder-launched missile से मार गिराया।
इस दावे ने इसलिए भी ध्यान खींचा क्योंकि अमेरिकी F-15E Strike Eagle से जुड़ी एक अलग घटना में विमान के नुकसान और उसके चालक दल के सुरक्षित बचाए जाने की रिपोर्टें पहले सामने आ चुकी हैं। इस घटना ने ईरान की सैन्य क्षमताओं और अमेरिकी लड़ाकू विमानों की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े किए थे।
हालांकि सोशल मीडिया पर प्रसारित कुछ पोस्ट इस घटना को दक्षिणी इराक से जोड़ती हैं, इसलिए स्थान और घटना के विवरण को लेकर सावधानी जरूरी है। किसी भी नए दावे को आधिकारिक या स्वतंत्र स्रोतों से पुष्टि के बाद ही अंतिम रूप से पुष्ट खबर माना जाना चाहिए।
तुर्की में F-16 दुर्घटनाग्रस्त, पायलट सुरक्षित
इसी बीच तुर्की से भी F-16 को लेकर बड़ी खबर सामने आई। 12 अगस्त को उत्तर-पश्चिमी तुर्की के यालोवा प्रांत में प्रशिक्षण उड़ान के दौरान तुर्की वायुसेना का एक F-16 लड़ाकू विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया।
तुर्की के रक्षा मंत्रालय के अनुसार पायलट सुरक्षित रूप से विमान से बाहर निकल गया। हादसे के कारणों की जांच की जा रही है।
तुर्की का यह हादसा ईरान-अमेरिका सैन्य टकराव से अलग घटना है। हालांकि एक ही समय में क्षेत्र में लड़ाकू विमानों से जुड़ी कई खबरें सामने आने के कारण सोशल मीडिया पर इन घटनाओं को एक-दूसरे से जोड़कर देखा जा रहा है।
30 सितंबर तक इराक से अमेरिकी सैनिकों की वापसी
इन सबके बीच अमेरिका ने इराक को लेकर एक बड़ा फैसला किया है। अमेरिकी और इराकी अधिकारियों के अनुसार 30 सितंबर 2026 तक इराक से अमेरिकी सैनिकों की पूरी वापसी की योजना है।
यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिकी सैन्य मौजूदगी का मौजूदा अध्याय 2003 के अमेरिकी नेतृत्व वाले सैन्य अभियान के बाद शुरू हुआ था। लगभग 23 वर्षों के बाद इराक से अमेरिकी सैन्य मिशन के समाप्त होने की दिशा में यह एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
इराक में आतंकवाद विरोधी अभियानों और देश की सुरक्षा में अमेरिकी सैनिकों की भूमिका रही है, लेकिन पिछले वर्षों में इराकी सुरक्षा बलों की जिम्मेदारी लगातार बढ़ाई गई है। अब सुरक्षा की जिम्मेदारी और अधिक स्थानीय बलों के हाथों में जाने की तैयारी है।
हालांकि अमेरिकी सैनिकों की वापसी का मतलब यह नहीं है कि वॉशिंगटन और बगदाद के संबंध समाप्त हो जाएंगे। दोनों देशों के बीच आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा सहयोग के दूसरे रास्ते खुले रहने की संभावना है।
क्या बदल रही है अमेरिका की मध्य पूर्व रणनीति?
अमेरिका का इराक से सैन्य रूप से पीछे हटना ऐसे समय में हो रहा है जब ईरान के साथ उसका तनाव बेहद महत्वपूर्ण बना हुआ है।
इराक ईरान के पड़ोस में है और वहां ईरान समर्थित सशस्त्र समूहों का प्रभाव लंबे समय से चर्चा में रहा है। ऐसे में अमेरिकी सैन्य वापसी को केवल इराक की घरेलू सुरक्षा नीति के नजरिए से देखना पर्याप्त नहीं होगा।
हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि अमेरिकी वापसी सीधे तौर पर ईरान के दबाव का परिणाम है, लेकिन क्षेत्रीय परिस्थितियों को देखते हुए इस फैसले का रणनीतिक महत्व जरूर है।
इजरायल का रुख और सख्त
दूसरी ओर इजरायल ने लेबनान, सीरिया और गाजा को लेकर अपनी नीति में नरमी के संकेत नहीं दिए हैं। इजरायल के रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज ने कहा है कि इजरायली सेना इन क्षेत्रों में बनाए गए सुरक्षा क्षेत्रों से पीछे नहीं हटेगी। दक्षिणी लेबनान को लेकर भी इजरायल का रुख बेहद सख्त है।
इजरायल की दलील है कि उसकी सैन्य मौजूदगी सुरक्षा जरूरतों से जुड़ी हुई है। दूसरी ओर लेबनान और क्षेत्रीय पक्ष इसे अपनी संप्रभुता तथा क्षेत्रीय स्थिरता के लिए गंभीर मुद्दा मानते हैं। यही वजह है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच किसी समझौते की दिशा में बातचीत आगे बढ़ती है, तो इजरायल की प्रतिक्रिया बेहद महत्वपूर्ण होगी।
UAE और ईरान के बीच अरबों डॉलर और सोने की खबर
इसी पूरे घटनाक्रम के बीच संयुक्त अरब अमीरात और ईरान को लेकर एक और बड़ी खबर चर्चा में है। रिपोर्टों में दावा किया गया है कि UAE ने ईरान की जमी हुई संपत्तियों में से कई अरब डॉलर जारी किए हैं, जबकि करीब 283 मिलियन डॉलर मूल्य के सोने का भी उल्लेख किया गया है।
कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया कि यह वित्तीय व्यवस्था ऐसे समय में सामने आई जब ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के साथ-साथ खाड़ी देशों को संभावित सैन्य हमलों की चिंता बनी हुई थी। कुछ सूत्रों ने इसे UAE और ईरान के बीच तनाव कम करने की कोशिश से भी जोड़ा है।
रिपोर्टों में UAE की Royal Jet से जुड़े एक Boeing 737 विमान के 11 और 12 अगस्त को अबू धाबी से ईरान जाने का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि किसी विमान की आवाजाही अपने आप में यह साबित नहीं करती कि उसमें ईरानी धन या सोना ही ले जाया गया था।
इसलिए 283 मिलियन डॉलर के सोने और कथित वित्तीय हस्तांतरण की खबर को फिलहाल रिपोर्ट या दावा मानकर ही देखा जाना चाहिए। UAE की ओर से इस विशेष दावे की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि सामने आना अभी बाकी है।
इससे पहले भी ईरान की जमी हुई संपत्तियों को लेकर UAE के माध्यम से अरबों डॉलर जारी किए जाने की खबरें सामने आई थीं। हालांकि UAE ने ऐसे दावों का खंडन किया था।
अगर भविष्य में इस कथित वित्तीय व्यवस्था की आधिकारिक पुष्टि होती है, तो इसका असर केवल UAE और ईरान के संबंधों पर नहीं बल्कि अमेरिका की ईरान नीति और पूरे खाड़ी क्षेत्र के शक्ति संतुलन पर भी पड़ सकता है।
यमन और बाब-अल-मंदब पर बढ़ता तनाव
मध्य पूर्व का संकट केवल अमेरिका, ईरान और इजरायल तक सीमित नहीं है। यमन और लाल सागर का क्षेत्र भी लगातार तनाव का केंद्र बना हुआ है।
बाब-अल-मंदब दुनिया के महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में शामिल है। यहां किसी भी बड़े सैन्य टकराव का असर केवल यमन और सऊदी अरब तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी, ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक व्यापार पर भी पड़ सकता है।
हूती बलों और उनके विरोधी पक्षों के बीच जारी तनाव ने पहले भी लाल सागर में अंतरराष्ट्रीय जहाजों की सुरक्षा को प्रभावित किया है। यही वजह है कि इस क्षेत्र की हर सैन्य गतिविधि पर अमेरिका और खाड़ी देशों के साथ-साथ पूरी दुनिया की नजर रहती है।
ट्रंप के सामने विदेश नीति के साथ घरेलू चुनौती
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने विदेश नीति के साथ घरेलू राजनीति भी बड़ी चुनौती है। मध्यावधि चुनावों से पहले ईरान के साथ तनाव, सैन्य खर्च, तेल की कीमतें और अमेरिकी सैनिकों की सुरक्षा जैसे मुद्दे अमेरिकी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
यदि अमेरिका ईरान के साथ समझौते की दिशा में आगे बढ़ता है, तो ट्रंप को एक तरफ क्षेत्रीय सहयोगियों की चिंताओं को संभालना होगा और दूसरी तरफ घरेलू राजनीतिक दबाव का भी सामना करना पड़ेगा।
इजरायल में भी राजनीतिक दबाव
इजरायल में भी आगामी चुनावों और आंतरिक राजनीति के कारण सरकार पर दबाव बना हुआ है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार के लिए गाजा, लेबनान और ईरान से जुड़े फैसले केवल सुरक्षा के मुद्दे नहीं हैं, बल्कि घरेलू राजनीति से भी जुड़े हुए हैं।
ऐसे में नेतन्याहू सरकार के लिए किसी भी बड़े सुरक्षा समझौते या सैन्य वापसी का फैसला राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो सकता है।
अमेरिका-ईरान समझौता हुआ तो क्या बदलेगा?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि अमेरिका और ईरान के बीच आगे क्या होगा।
दोनों देशों के बीच संभावित समझौते को लेकर बातचीत और कूटनीतिक प्रयास जारी रहने की खबरें सामने आती रही हैं, लेकिन कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर मतभेद बने हुए हैं। प्रतिबंधों में राहत, ईरान की संपत्तियां, क्षेत्रीय सुरक्षा और रणनीतिक समुद्री मार्ग जैसे मुद्दे किसी भी समझौते के लिए बेहद महत्वपूर्ण होंगे।
यदि अमेरिका और ईरान किसी समझौते तक पहुंचते हैं तो इसका असर पूरे मध्य पूर्व पर पड़ेगा। लेकिन यहां इजरायल की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि इजरायल पहले ही ईरान और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों को अपनी सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा मानता रहा है।
बदल रहा है मध्य पूर्व का शक्ति संतुलन?
अमेरिकी F-15 से जुड़ी खबर, तुर्की का F-16 हादसा, इराक से अमेरिकी सैनिकों की प्रस्तावित वापसी, UAE-ईरान के कथित वित्तीय लेनदेन, इजरायल की लेबनान और सीरिया में सैन्य मौजूदगी तथा यमन और बाब-अल-मंदब में जारी तनाव—ये सभी घटनाक्रम अलग-अलग हैं, लेकिन एक बड़े बदलते क्षेत्रीय माहौल की ओर जरूर संकेत करते हैं।
एक तरफ अमेरिका इराक में अपनी सैन्य भूमिका समाप्त करने की दिशा में बढ़ रहा है, दूसरी तरफ इजरायल अपनी सुरक्षा नीति पर कायम है। वहीं ईरान के साथ संभावित कूटनीतिक समझौते की चर्चा के बीच खाड़ी देशों की अपनी सुरक्षा चिंताएं भी सामने आ रही हैं।
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल चुका है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि अमेरिका, ईरान, इजरायल और खाड़ी देशों के बीच पुराने समीकरण तेजी से बदल रहे हैं।
आने वाले दिनों में यह तय होगा कि यह बदलाव कूटनीति के रास्ते आगे बढ़ता है या फिर क्षेत्र को एक और बड़े सैन्य टकराव की ओर ले जाता है। यह भी पढ़ें







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