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मदरसों को आतंकवाद से जोड़ने पर फिर विवाद, केशव प्रसाद मौर्य के बयान पर अरशद मदनी का करारा जवाब

On: August 12, 2026 4:48 PM
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केशव प्रसाद मौर्य के बयान पर अरशद मदनी का करारा जवाब
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देश के दीनी-मदरसों को लेकर एक बार फिर सियासी और सामाजिक बहस तेज हो गई है। इस बार विवाद उस वक्त बढ़ गया जब उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की ओर से मदरसा शिक्षा को आतंकवाद से जोड़कर टिप्पणी की गई। मदरसों को लेकर इस तरह के आरोप पहले भी सामने आते रहे हैं, और इस बार भी बयान में भारत के साथ-साथ पाकिस्तान और बांग्लादेश के मदरसों को आतंकवाद का अड्डा कहा गया है। इसके बाद मुस्लिम संगठनों और उलेमा की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया सामने आई है।

उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने मदरसों को लेकर गंभीर आरोप लगाए। उनके बयान को इस तरह पेश किया गया कि मदरसों में पढ़ने वाले लोगों के भीतर आतंकवादी जैसी सोच पैदा होती है और मदरसों को आतंकवाद से जोड़कर देखा जाना चाहिए। इस बयान के बाद सवाल उठने लगा कि क्या किसी पूरे शिक्षा तंत्र को कुछ लोगों की कथित गतिविधियों के आधार पर आतंकवाद से जोड़ना उचित है?

मामला केवल भारत के मदरसों तक सीमित नहीं रहा। बयान में पाकिस्तान और बांग्लादेश के मदरसों का भी जिक्र किया गया। और अब इस बयान पर धार्मिक संगठनों की तरफ से भी तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने केशव प्रसाद मौर्य के बयान को शर्मनाक और अज्ञानता पर आधारित बताया है।

मदरसों को आतंकवाद से जोड़ने पर अरशद मदनी का जवाब

मौलाना अरशद मदनी ने मदरसों को आतंकवाद से जोड़ने वाली सोच पर सवाल उठाते हुए कहा कि जिन लोगों को मदरसों के इतिहास की जानकारी नहीं है, वही इस तरह के बयान दे सकते हैं। उनका कहना है कि भारत में मदरसों और उनसे जुड़े उलेमा ने केवल धार्मिक शिक्षा देने का काम नहीं किया, बल्कि देश के इतिहास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

मौलाना अरशद मदनी का तर्क है कि अंग्रेजी शासन के दौरान मदरसा शिक्षा से जुड़े लाखों उलेमा ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया था। उन्होंने अपनी जान और माल की कुर्बानी दी और देश की आजादी के आंदोलन में हिस्सा लिया। ऐसे में आज उन्हीं मदरसों को आतंकवाद से जोड़ना इतिहास के उस हिस्से को नजरअंदाज करने के बराबर है।

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अगर मदरसों और वहां के उलेमा की कुर्बानियों का इतिहास सही तरीके से पढ़ा जाए तो शायद इस तरह के आरोप लगाने से पहले लोग कई बार सोचेंगे।

दारुल उलूम देवबंद

भारत में मदरसा शिक्षा के इतिहास की चर्चा में दारुल उलूम देवबंद का नाम भी प्रमुख रूप से सामने आता है। दारुल उलूम देवबंद की स्थापना 1866 में हुई थी। यह संस्थान लंबे समय से इस्लामी शिक्षा का प्रमुख केंद्र माना जाता है और इससे जुड़े अनेक बड़े उलेमा ने ब्रिटिश शासन के दौर में देश की आजादी की गतिविधियों में खासतौर से हिस्सा लिया।

शेखुल हिंद मौलाना महमूद उल हसन देवबंदी और मौलाना रशीद अहमद गंगोही जैसे बड़े नाम मदरसा शिक्षा के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। मदरसों के समर्थकों का कहना है कि ऐसे इतिहास को नजरअंदाज करके पूरे मदरसा शिक्षा तंत्र को आतंकवाद से जोड़ना उचित नहीं हो सकता।

मदरसों की भूमिका पर बहस करने वालों के सामने यही सवाल रखा जा रहा है कि अगर किसी संस्थान में कोई व्यक्ति गलत गतिविधि में शामिल पाया जाता है तो कार्रवाई उस व्यक्ति या संबंधित संस्था के खिलाफ होनी चाहिए। लेकिन उसके आधार पर देश के तमाम मदरसों को एक ही नजर से देखना कितना सही है, इस पर भी विचार होना चाहिए।

इसी बीच बांग्लादेश मूल की लेखिका तसलीमा नसरीन के बयानों ने इस पूरे विवाद को और चर्चा में ला दिया है। तसलीमा नसरीन लंबे समय से धार्मिक मामलों, मुस्लिम समाज और व्यक्तिगत कानूनों को लेकर अपने विवादित विचारों के लिए जानी जाती है।

उनकी ओर से मदरसों और यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर दिए गए बयानों पर भी मुस्लिम संगठनों की ओर से आपत्ति जताई गई है। उनके समर्थक उनके विचारों को महिलाओं के अधिकार और समानता से जोड़कर देखते हैं, जबकि विरोध करने वाले लोग उनकी टिप्पणियों को मुस्लिम धार्मिक व्यवस्था पर हमला मानते हैं।

तसलीमा नसरीन का कहना है कि भारत में महिलाओं को समान अधिकार देने के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड जरूरी है। उनका तर्क है कि अगर अलग-अलग धार्मिक कानूनों की व्यवस्था जारी रहती है तो महिलाओं को समानता हासिल करने में कठिनाई हो सकती है।

दूसरी ओर मुस्लिम संगठनों का कहना है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में धार्मिक और व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े मामलों पर बहस भारतीय नागरिकों और संवैधानिक संस्थाओं के बीच होनी चाहिए। उनका आरोप है कि किसी बाहरी व्यक्ति की ओर से भारत के आंतरिक मामलों को लेकर इस तरह की टिप्पणी करना उचित नहीं है।

तसलीमा नसरीन के बयानों को लेकर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने आने की बात कही गई है। बोर्ड की ओर से उनके मदरसों और यूनिफॉर्म सिविल कोड से जुड़े बयानों पर आपत्ति जताई गई है।

बोर्ड का रुख यह बताया गया कि भारत के मुस्लिम समाज, मदरसों और व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े मुद्दे देश के आंतरिक मामले हैं। इन मामलों पर किसी भी तरह की टिप्पणी को लेकर मुस्लिम संगठन अपनी असहमति व्यक्त कर सकते हैं और संवैधानिक तरीके से अपनी बात रख सकते हैं।

यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर देश में पहले से ही अलग-अलग राय मौजूद हैं। एक पक्ष इसे समान कानून और समान अधिकार से जोड़कर देखता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत कानूनों से जोड़कर देखता है। इसलिए इस मुद्दे पर बहस लगातार जारी है।

मदरसों को लेकर उत्तर प्रदेश में पहले भी कई बार विवाद सामने आ चुके हैं। कभी मदरसों की जमीन और दस्तावेजों को लेकर सवाल उठाए गए, तो कभी उनके संचालन और आर्थिक व्यवस्था की जांच और सर्वे की बात सामने आई।

मदरसों की ओर से लगातार यह कहा गया कि बड़ी संख्या में मदरसे मुस्लिम समाज की ओर से मिलने वाली जकात और चंदे से चलते हैं। उनका कहना है कि उन्हें सरकारी फंड पर निर्भर होकर अपना संचालन नहीं करना पड़ता और समुदाय के लोग अपनी धार्मिक जिम्मेदारी के तहत इन संस्थानों की मदद करते हैं।

इसके बाद मदरसों के सर्वे की बात सामने आई। मदरसा संचालकों ने भी सर्वे में हिस्सा लिया और अपने संस्थानों से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराई। उनका कहना था कि अगर सरकार को किसी संस्था के दस्तावेज या संचालन को लेकर कोई सवाल है तो कानूनी प्रक्रिया के तहत उसकी जांच की जा सकती है।

मदरसों को लेकर एक और बड़ा मुद्दा उनके पाठ्यक्रम का रहा है। सरकार की तरफ से यह बात उठाई जाती रही है कि मदरसों में धार्मिक शिक्षा के साथ आधुनिक विषयों की पढ़ाई भी होनी चाहिए।

मदरसों से जुड़े लोगों की ओर से भी यह कहा गया कि वे चाहते हैं कि बच्चों को धार्मिक शिक्षा के साथ आधुनिक शिक्षा का अवसर मिले, ताकि मदरसे से निकलने वाला छात्र आगे स्कूल और अन्य शिक्षण संस्थानों में अपनी पढ़ाई जारी रख सके।

यानी मदरसा शिक्षा को आधुनिक बनाने को लेकर बातचीत की गुंजाइश हमेशा रही है। लेकिन विवाद तब पैदा होता है जब सुधार की बहस के बजाय पूरे मदरसा सिस्टम को आतंकवाद या देश विरोधी गतिविधियों से जोड़ दिया जाता है।

मदरसों को आतंकवाद से जोड़ने वाले बयानों पर सबसे बड़ा सवाल यही उठाया जा रहा है कि क्या इसके समर्थन में ठोस प्रमाण मौजूद हैं? अगर किसी व्यक्ति पर आतंकवादी गतिविधि, जासूसी या देश विरोधी गतिविधि का आरोप लगता है तो उसकी जांच एजेंसियों द्वारा जांच की जानी चाहिए और दोष साबित होने पर कानून के तहत सजा मिलनी चाहिए।

लेकिन किसी व्यक्ति के कथित अपराध को पूरे समाज या पूरे शिक्षा तंत्र से जोड़ देना एक अलग विषय है। मदरसों के समर्थकों का कहना है कि देश में स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय और अन्य संस्थानों में पढ़े लोग भी अलग-अलग तरह के अपराधों में आरोपी बन सकते हैं। ऐसे में किसी एक संस्थान या शिक्षा व्यवस्था को सामूहिक रूप से कटघरे में खड़ा करना उचित नहीं है।

मौलाना अरशद मदनी और मदरसा शिक्षा के समर्थक लगातार इस बात को सामने रखते हैं कि भारत की आजादी की लड़ाई में मदरसा पृष्ठभूमि वाले उलेमा ने योगदान दिया था।

उनका कहना है कि ब्रिटिश शासन के दौर में कई धार्मिक विद्वानों ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया। अनेक लोगों ने जेल यात्राएं कीं और अपनी जान तक कुर्बान की। इसलिए आज जब मदरसों पर आतंकवाद के आरोप लगाए जाते हैं तो उनके समर्थक सवाल करते हैं कि क्या इतिहास के इस योगदान को भी साथ-साथ याद नहीं किया जाना चाहिए?

दारुल उलूम देवबंद और उससे जुड़े उलेमा का इतिहास भी इसी बहस में सामने लाया जाता है। मदरसा समर्थकों के अनुसार धार्मिक शिक्षा और देशभक्ति एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं और देश के प्रति जिम्मेदारी का भाव किसी एक प्रकार की शिक्षा तक सीमित नहीं हो सकता।

मदरसों के समर्थकों का आरोप है कि पहले मदरसों को अवैध जमीन, दस्तावेज और फंडिंग के सवालों पर घेरा गया। इसके बाद सर्वे और पाठ्यक्रम को लेकर सवाल उठाए गए और अब उन्हें आतंकवाद से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।

उनका कहना है कि अगर किसी मदरसे के दस्तावेज में समस्या है तो उसकी जांच होनी चाहिए। अगर कहीं गैरकानूनी गतिविधि होती है तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन पूरे मदरसा शिक्षा तंत्र को बदनाम करना उचित नहीं है।

हालांकि दूसरी तरफ सरकार और मदरसों की व्यवस्था पर सवाल उठाने वाले लोग यह तर्क देते हैं कि धार्मिक शिक्षा देने वाले संस्थानों में पारदर्शिता, आधुनिक शिक्षा और कानून के पालन को सुनिश्चित करना जरूरी है। इसलिए इस विषय पर बहस को आरोपों के बजाय नियमों, आंकड़ों और प्रमाणों पर केंद्रित किया जाना चाहिए।

मदरसों को लेकर मौजूदा विवाद ने कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या मदरसा शिक्षा में आधुनिक विषयों को और मजबूत किया जाना चाहिए? क्या धार्मिक संस्थानों की पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए नियम बनाए जाने चाहिए? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या किसी पूरे शिक्षा तंत्र को आतंकवाद से जोड़ना उचित है?

इन सवालों पर अलग-अलग लोगों की अलग-अलग राय हो सकती है। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी संस्था या समुदाय पर गंभीर आरोप लगाने के लिए ठोस तथ्य और प्रमाण जरूरी होते हैं।

फिलहाल केशव प्रसाद मौर्य के बयान के बाद मदरसों को लेकर बहस फिर तेज हो गई है। मौलाना अरशद मदनी ने इसका जवाब देते हुए मदरसों के इतिहास और आजादी की लड़ाई में उलेमा की भूमिका को सामने रखा है। वहीं तसलीमा नसरीन के बयानों और यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर भी मुस्लिम संगठनों की आपत्ति सामने आई है।

अब देखना यह होगा कि आने वाले दिनों में यह विवाद केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहता है या सरकार, मदरसा संचालक और मुस्लिम संगठन मिलकर शिक्षा व्यवस्था से जुड़े वास्तविक मुद्दों पर कोई ठोस चर्चा करते हैं।

आप इस पूरे मामले को किस तरह देखते हैं? क्या मदरसों को आतंकवाद से जोड़ना सही है या फिर किसी भी संस्था के बारे में बात करते समय उसके खिलाफ ठोस प्रमाण होना जरूरी है? अपनी राय कमेंट सेक्शन में जरूर बताएं। यह भी पढ़ें

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हिन्द न्यूज़ डेस्क

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