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मदरसों पर बयानबाजी असहनीय: मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड

On: August 7, 2026 10:12 PM
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मदरसों पर बयानबाजी असहनीय: मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड
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बांग्लादेश की विवादित और फरार लेखिका तसलीमा नसरीन के धार्मिक मदरसों और यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) को लेकर दिए गए कथित बयानों पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया सामने आई है। बोर्ड ने उनके बयानों को भारत के आंतरिक मामलों में एक विदेशी की गैर-जिम्मेदाराना दखलंदाजी करार देते हुए इसकी कड़ी निंदा की है।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि 19 साल बाद भारत लौटने वाली बांग्लादेश की विवादित और फरार लेखिका तसलीमा नसरीन ने कोलकाता में मीडिया से बातचीत के दौरान यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी UCC और धार्मिक मदरसों को लेकर बेहद भड़काऊ, गुमराह करने वाले और तथ्यों से रहित बयान दिए हैं।

मदरसों को लेकर लगाए गए आरोपों पर बोर्ड की कड़ी आपत्ति

बोर्ड के प्रवक्ता डॉ. सैयद कासिम रसूल इलियास ने अपने बयान में कहा कि यह कहना कि धार्मिक मदरसे उग्रवाद को बढ़ावा देते हैं या वहां से जिहादी तैयार होते हैं, सरासर झूठ और एक पूरी धार्मिक एवं शैक्षणिक परंपरा को बदनाम करने की निंदनीय कोशिश है।

उन्होंने कहा कि इस तरह के बेबुनियाद आरोप न केवल करोड़ों भारतीय मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाते हैं, बल्कि देश के सांप्रदायिक माहौल को भी खराब करने की जानबूझकर की गई कोशिश हैं।

विदेशी होने का हवाला देते हुए सरकार से कार्रवाई की मांग

डॉ. इलियास ने कहा कि यह बेहद अफसोस की बात है कि एक विदेशी नागरिक, जो वर्तमान में भारत में शरण लेकर रह रही हैं, वह इसी देश के धार्मिक, संवैधानिक और सामाजिक मामलों पर कथित तौर पर ऐसी टिप्पणियां कर रही हैं, जिन्हें समाज में नफरत और विवाद फैलाने वाला माना जा रहा है। उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है, लेकिन इस अधिकार का इस्तेमाल किसी धर्म, धार्मिक संस्था या सामाजिक व्यवस्था को बदनाम करने अथवा समाज में वैमनस्य फैलाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि भारत की धरती सभी धर्मों और समुदायों का सम्मान करने वाली संस्कृति के लिए जानी जाती है। ऐसे में अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर धार्मिक संस्थानों के खिलाफ कथित तौर पर नफरत फैलाने, देश के संवैधानिक ढांचे पर सवाल उठाने या भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप जैसी गतिविधियों को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता। उनका कहना था कि इस तरह की बयानबाजी सामाजिक सौहार्द और आपसी विश्वास को भी प्रभावित कर सकती है।

बांग्लादेश को लेकर दिए बयान पर भी सवाल

डॉ. इलियास ने कहा कि तसलीमा नसरीन ने बांग्लादेश से जुड़े मुद्दों पर भी जिस प्रकार की भाषा और शब्दों का इस्तेमाल किया है, वह न केवल गैर-जिम्मेदाराना प्रतीत होता है, बल्कि भारत की संतुलित और पड़ोसी देशों के प्रति सम्मानजनक विदेश नीति की भावना के अनुरूप भी नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों को ऐसे विषयों पर अधिक जिम्मेदारी और संयम के साथ अपनी बात रखनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि इस तरह के बयान दोनों देशों के बीच आपसी संबंधों और कूटनीतिक माहौल को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। इसलिए भारत सरकार को इस पहलू पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए और आवश्यक होने पर उचित कदम उठाने चाहिए।

मदरसों के खिलाफ प्रचार अभियान का आरोप

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता ने कहा कि धार्मिक मदरसों के खिलाफ इस प्रकार का प्रचार अभियान कोई नई बात नहीं है। उनका कहना था कि पिछले कई दशकों से समय-समय पर मदरसों पर विभिन्न प्रकार के आरोप लगाए जाते रहे हैं, लेकिन अब तक आरोप लगाने वाला कोई भी व्यक्ति या संस्था इन दावों के समर्थन में कोई ठोस और विश्वसनीय प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सकी है।

उन्होंने कहा कि देश की विभिन्न जांच एजेंसियों और सुरक्षा एजेंसियों ने भी इन आरोपों की व्यापक स्तर पर पुष्टि नहीं की है। इसके बावजूद धार्मिक मदरसों को लगातार विवादों के केंद्र में रखने की कोशिश की जाती रही है। बोर्ड का आरोप है कि यह एक संगठित राजनीतिक और वैचारिक अभियान का हिस्सा बन गया है, जिसका उद्देश्य धार्मिक शिक्षण संस्थानों की छवि को प्रभावित करना है।

लाखों बच्चों को शिक्षा देने का दावा

डॉ. इलियास ने कहा कि वास्तविकता यह है कि देशभर में संचालित धार्मिक मदरसे बिना सरकारी खजाने पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाले लाखों बच्चों को शिक्षा उपलब्ध करा रहे हैं। उन्होंने कहा कि इन संस्थानों में बड़ी संख्या में ऐसे परिवारों के बच्चे भी शिक्षा प्राप्त करते हैं, जिन्हें अन्य संसाधनों तक आसानी से पहुंच नहीं मिल पाती।

उन्होंने कहा कि मदरसों से शिक्षा प्राप्त करने वाले हजारों छात्र आगे चलकर देश की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटीज में उच्च शिक्षा हासिल करते हैं और न्यायपालिका, शिक्षा, पत्रकारिता, सिविल सेवा तथा अन्य अनेक क्षेत्रों में अपनी महत्वपूर्ण सेवाएं दे रहे हैं। उनके अनुसार, ऐसे शैक्षणिक संस्थानों को बिना ठोस आधार के बदनाम करना न केवल न्याय और निष्पक्षता के सिद्धांतों के विरुद्ध है, बल्कि इससे देश की शैक्षणिक व्यवस्था और सामाजिक एकता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

सरकार से गंभीरता से संज्ञान लेने की मांग

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भारत सरकार से मांग की कि तसलीमा नसरीन की कथित भड़काऊ बयानबाजी का गंभीरता से संज्ञान लिया जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि भारत में रह रहे विदेशी नागरिक या शरणार्थी देश के आंतरिक, धार्मिक और संवेदनशील मामलों में ऐसी टिप्पणियां न करें, जिनसे सामाजिक तनाव या विवाद की स्थिति उत्पन्न हो।

बोर्ड ने यह भी मांग की कि सरकार ऐसे मामलों में आवश्यक कदम उठाए, ताकि देश का संवैधानिक, सामाजिक और सांप्रदायिक सौहार्द किसी भी बाहरी व्यक्ति की कथित नफरत फैलाने वाली राजनीति या विवादित बयानबाजी से प्रभावित न हो।

तसलीमा नसरीन के बयान के बाद बढ़ी हलचल

तसलीमा नसरीन के बयान के बाद देशभर में इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर चर्चाएं तेज हो गई हैं। विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय के विभिन्न संगठनों की ओर से मदरसों को लेकर दिए गए उनके बयान पर नाराजगी और विरोध देखने को मिल रहा है।

इस मामले में उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने आ चुकी है। इससे पहले जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने भी इस मुद्दे पर अपना पक्ष रखा था। अब ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के बयान के बाद यह विषय एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का केंद्र बन गया है।

फिलहाल इस पूरे मामले को लेकर राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और विभिन्न वर्गों की ओर से अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। बयानबाजी के बीच मदरसों की भूमिका, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाएं और भारत के आंतरिक मामलों में विदेशी नागरिकों की टिप्पणियों को लेकर बहस लगातार तेज होती दिखाई दे रही है। यह भी पढ़ें

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हिन्द न्यूज़ डेस्क

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